लालच छोड़ो, सुख पाओ | Buddha Gyaan Story

लालच छोड़ो, सुख पाओ।

क्या आप जानते हैं…

इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसका अपना लालच है।

लालच कभी खत्म नहीं होता…

बल्कि और बढ़ता जाता है।

यह हमें न तो चैन से जीने देता है…

न ही जीवन का आनंद लेने देता है।

आज की कहानी आपको दिखाएगी…

कि कैसे एक छोटी-सी सीख से हम लालच को छोड़कर सच्चा सुख पा सकते हैं।

अगर आप भी जीवन में बेचैनी या असंतोष महसूस करते हैं…

तो इस कहानी को अंत तक पढ़े सुनिए।

रामकिशन एक साधारण किसान था।

उसके पास जमीन भी थी… घर भी था… और मेहनती परिवार भी।

पर वह कभी संतुष्ट नहीं होता।

जब भी वह दूसरों को बड़ी जमीन या अधिक धन कमाते देखता… उसका मन जलने लगता।

उसके पास जो था… वह उसे छोटा लगता।

धीरे-धीरे उसका मन कड़वा और असंतुष्ट हो गया।

परिवार और पड़ोसी उससे दूर रहने लगे…

क्योंकि वह हमेशा शिकायत करता रहता था।

एक दिन वह एक संत के पास पहुँचा और बोला,

“संत जी, मेरे पास सबकुछ है… फिर भी मैं खुश क्यों नहीं हूँ?

हर समय लगता है कि मेरे पास कम है।”

संत मुस्कुराए… और उसे एक खाली कटोरा देकर बोले,

“इसे पानी से भरकर लाओ।”

रामकिशन ने पास के कुएँ से कटोरा भरकर लाया।

संत ने उसमें चीनी की एक चुटकी डाल दी और बोले,

“अब पीकर देखो।”

रामकिशन ने पानी पिया और बोला,

“संत जी, बहुत मीठा है।”

फिर संत ने उसमें और-और चीनी डालनी शुरू कर दी।

इतनी चीनी डाल दी कि पानी गाढ़ा होकर कड़वा लगने लगा।

रामकिशन का चेहरा बिगड़ गया।

संत ने समझाते हुए कहा,

“बेटा, यही जीवन है।

थोड़ी-सी इच्छाएँ मिठास देती हैं…

पर जब इच्छाएँ और लालच बढ़ जाता है…

तो वही जीवन को कड़वा बना देता है।

जो तुम्हारे पास है… उसमें संतोष करो…

तभी आनंद मिलेगा।”

फिर संत ने बुद्ध का एक वचन सुनाया,

“लालच उस आग की तरह है…

जो जितना ईंधन पाती है… उतनी ही और भड़कती जाती है।”

रामकिशन ने उसी दिन से एक संकल्प लिया…

अब वह अपने खेत, अपने परिवार और अपनी साधारण-सी जिंदगी में संतोष ढूंढेगा।

धीरे-धीरे उसके मन से जलन और शिकायत खत्म हो गई।

वह अधिक हँसने लगा…

लोग फिर से उसके करीब आने लगे।

रामकिशन ने समझ लिया कि सच्चा सुख…

‘अधिक पाने’ में नहीं…

बल्कि ‘कम में संतोष’ पाने में है।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है –

पहला… लालच कभी खत्म नहीं होता, जितना बढ़ाओ उतना बढ़ता है।

दूसरा… जो हमारे पास है, उसमें संतोष करना ही सच्चा सुख है।

तीसरा… कृतज्ञता और संतोष ही जीवन को मधुर बनाते हैं।

बुद्ध कहते हैं…

“संतोष सबसे बड़ा धन है।”

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